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छठ पूजा- विधि ,महत्व और इतिहास – History of Chhath Puja

Published by Ankit S on

छठ पूजा – History of Chhath puja

History of Chhath pujaकार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला पर्व छठ भगवान सूर्य को समर्पित है। सालों साल से मनाया जाने वाला पर्व छठ 4 दिनों तक चलता है ।

यह पर्व काफी कठिन पर्व में से एक माना जाता है। इसे करने वाली स्त्रियां धन-धान्य ,पति पुत्र तथा सुख समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं तथा चर्म रोग एवं आंख की बीमारी से भी छुटकारा मिलता है।

जिस दिन छठी माता की पूजा की जाती है और छोटी माता बच्चों की रक्षा करती हैं । संतान प्राप्त की इच्छा के लिए भी किया जाता है । इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं_Continue reading..

छठ पूजा विधि और महत्व- History of Chhath puja

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यह पर 4 दिन का होता है। बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है । इसके उत्तर भारत में सबसे  बड़ा  त्यौहार  मानते  हैं । इसमें  गंगा  स्नान  का महत्व अधिक होता हैं। स्त्री और पुरुष दोनों करते हैं। 

1. नहान खाएं-

यह पहला दिन होता है । यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता है ।इस दिन सूर्य उदय से पूर्व पवित्र नदियों मे स्नान किया जाता है। इसके बाद ही भोजन लिया जाता है इसमें कद्दू खाने का महत्व पुराणों में निकलता है।

2. लोहड़ा और खरना :-

यह दूसरा दिन होता है । जो कार्तिक शुक्ल की पंचमी कहलाती है। इसमें दिन _भर निराहार रहते हैं। रात्रि में खीर खाई जाती है। और प्रसाद के रूप में सभी को दी जाती है। इस दिन पास पड़ोसियों एवं रिश्तेदारों को न्योता दिया जाता है।

3. संध्या अर्ध्य :-

यह तीसरा दिन होता है जिसे कार्तिक शुक्ल की सृष्टि कहते हैं इस दिन संध्या में सूर्य पूजा कर डालते सूर्य को जल चढ़ाया जाता है। इसके लिए किसी नदी या तालाब के किनारे जाकर टोकरी एवं सुपडे में देने की सामग्री दी जाती है ।
एवं समूह में भगवान सूर्य देव को अर्धय दिया जाता है। इस समय दान का भी महत्व होता है ।इस दिन घरों में प्रसाद बनाया जाता है। जिसमें लड्डू का महत्व होता है।

4. ऊषा अर्घ्य :-

अंतिम चौथा दिन होता है। यह समाप्ति का दिन होता है । इस दिन उगते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है। एवं प्रसाद वितरण किया जाता है । पूरी विधि स्वच्छता के साथ पूरी की जाती है ।चार दिवसीय व्रत बहुत कठिन साधना से किया जाता है ।इसे हिंदू धर्म में सबसे बड़े वर्तो में से एक माना जाता है जो 4 दिनों तक चलता है।

व्रत के नियम:-

1. इसे घर की महिलाएं एवं पुरुष दोनों ही करते हैं ।इसमें सुरक्षा एवं नए कपड़े पहने जाते हैं। जिसमें सिलाई ना हो जैसे महिलाएं साड़ी वह धोती पहन सकते हैं ।

2 . इन 4 दिनों में व्रत करने वाला धरती पर सोता है इसके लिए कंबल और तथा चटाई का प्रयोग कर सकता है।

3. इन दिनों घरों में लहसुन एवं मांस का प्रयोग निषेध माना जाता है ।

4. इस त्योहार पर नदी एवं तालाब के तट पर मेला लगता है। इसमें छठ पूजा के गीत गाए जाते हैं ।जहां प्रसाद वितरण किया जाता है ।
5. इस त्यौहार में सूर्य देव की पूजा की जाती है।

सूर्य षष्ठी व्रत एवं उनसे संबंधित कथाएं- छठ पर्व कैसे शुरू हुआ? History of Chhath puja

इसको लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं-

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.बहुत समय पहले एक राजा रानी हुआ करते थे । उनकी कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप उनके राज्य में आए । राजा ने उनकी सेवा की महर्षि ने आशीर्वाद दिया ।इसके प्रभाव से रानी गर्भवती हो गई लेकिन उनकी संतान मृत पैदा हुई । जिसके कारण रानी अत्यंत दुखी थी । जिसके कारण दोनों ने आत्महत्या करने का निर्णय लिया।

जैसे ही वे दोनों नदी में कूदने को हुए उन्हें छठी माता ने दर्शन दिए। और कहा कि आप मेरी पूजा करें जिससे आपको अवश्य संतान की प्राप्ति होगी। राजा रानी ने विधि के साथ छठ की पूजा की और उन्हें स्वस्थ संतान की प्राप्ति हुई। तभी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह पूजा की जाती है।

राजा प्रेमवत की कहानी :-

१. पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रेमवत को लेकर है। कहते हैं _राजा प्रेमवत के पास कोई संतान नहीं थी। पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी का व्रत किया तो उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद से लोग छठ मनाते हैं।

महिपाल की कहानी :-

२. प्राचीन काल में बिंदुसर तीर्थ में महिपाल नाम का वणिक रहता था। धर्म ,कर्म तथा देवता विरोधी था। एक बार उसने सूर्य भगवान की प्रतिमा के सामने होकर मल मूत्र त्याग किया। जिसके परिणाम स्वरूप उसकी दोनों आंखें जाती रही।


एक दिन अपने आत्तायी जीवन से ऊब कर गंगा जी में कूदकर प्राण देने का निश्चय कर चल पड़ा। रास्ते में उसे ऋषि राज नारद जी मिले और पूछा कहिए सेठ! कहां जल्दी-जल्दी भागे जा रहे हो? अंधा सेठ रो पड़ा। और सांसारिक सुख दुख की प्रताड़ना से प्रताड़ित हो प्राण त्याग करने का इरादा बतलाया।

मुनि दया से गदगद होकर बोले हे अज्ञानी तू प्राण त्याग कर मत मार! भगवान सूर्य के क्रोध से तुम्हें यह दुख भुगतान पड़ रहा है। तू कार्तिक मास की सूर्य षष्टि का व्रत रख तेरा दुख दरिद्र मिट जाएगा। हुआ ठीक ने ऐसा ही किया और सुख_ समृद्धि पूर्ण दिव्य ज्योति वाला हो गया।

सूर्यपुत्र कर्ण भगवान सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने :-

३. वही मान्यता है कि छठ महाभारत काल से ही शुरू हुई थी। इसकी शुरुआत सूर्यपुत्र कर्ण ने की थी। कहा जाता है _कि भगवान सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने।

पूजा- विधि – History of Chhath puja

पूजा विधि विधान : इस व्रत में 3 दिन तक इसमें कठोर उपवास किया जाता है। इस व्रत को करने वाली स्त्री पंचमी के दिन एक बार बिना नमक का भोजन करती हैं और षष्ठी को बिना जल के रहती हैं ।षष्ठी को अस्त होते सूर्य की विधि पूर्वक पूजा करके अधर्य दिया जाता है।

विविध प्रकार के पकवान ,फल ,मिष्ठान आदि से सूर्य भगवान का भोग लगाया जाता है ।रात्रि जागरण कर दूसरे दिन प्रातः स्त्रियां स्नान करके गीत गाते हैं और सूर्योदय होते ही अधर्य देकर जल ग्रहण करके व्रत संपन्न करती हैं।

छठ पूजा का महत्व :-

लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव एवं छठी मैया का संबंध भाई _बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की उपासना काफी फलदाई मानी जाती है छठ का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सादगी, पवित्रता, एवं लोक पक्ष है। इसमें बांस से बने सुख में प्रसाद तथा लोकगीत के द्वारा लोग या पूजा संपन्न करते हैं।

इसके अलावा सूर्य की पूजा का महत्व इससे अधिक किसी पूजा में नहीं मिलता। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है । छठ पूजा के समय पर धरती पर सूरज की हानिकारक विकिरण आती है। मनुष्य जाति को कोई हानिकारक प्रभाव ना पड़े इसलिए नियमों से बांधकर इस व्रत को संपन्न किया जाता है। जिससे मनुष्य स्वस्थ रहता है।

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Ankit S

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26 Comments

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